अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में देवी नागरानी की रचनाएँ

नई ग़ज़लों में-
गिरा हूँ मुँह के बल
दिल से दिल तक
बादे बहार आई
सदा धूप में
सीप में मोती

अंजुमन में-
आँधियों के पर
क्या कशिश है
खुशी की हदों के पार
डर
दीवार-ओ-दर
बढ़ रही है आजकल
मेरे वतन की ख़ुशबू
रो दिए

शोर दिल में

कविताओं में-
भारत देश महान

 

 

मेरे वतन की खुशबू

बादे-सहर वतन की चंदन-सी आ रही है
यादों के पालने में मुझको झुला रही है।

ये जान कर भी अरमा होते नहीं हैं पूरे
पलकों पे ख़्वाब 'देवी' फिर भी सजा रही है।

कोई कमी नहीं है हमको मिला है सब कुछ
दूरी मगर वतन से मुझको रुला रही है।

पत्थर का शहर है ये, पत्थर के आदमी भी
बस ख़ामोशी ये रिश्ते, सब से निभा रही है।

शादाब मेरे दिल में इक याद है वतन की
तेरी भी याद उसमें, घुलमिल के आ रही है।

'देवी' महक है इसमें, मिट्टी की सौंधी-सौंधी
मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है।

24 अगस्त 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है