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ठंड

दरवाज़ा खोला
तो ठंड दरवाज़े पर,
बाँहें खोले -
आगे बढ़,
भेंटने को तैयार।

हवा घबराई-सी
इधर उधर पत्ते बुहारती,
ख़बरदार करती
घूम रही थी।

निकलूँ न निकलूँ का असमंजस फलाँग
मैं जैसे ही आई
ठंड के आगोश में
एक थप्पड़ लगा
झुँझलाई हुई हवा का -
"मना किया था न!"

और सूरज -
बादलों को भेद,
मुसकुरा उठा!

16 फरवरी 2007

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