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अनुभूति में महावीर शर्मा की कविताएँ

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पर्दा हटाया ही कहाँ है?

अंजुमन में
ग़ज़ल
प्रेम डगर
बुढ़ापा
ये ख़ास दिन

कविताओं में-
दो मौन

संकलन में-
दिये जलाओ- दीप जलते रहे
चराग आँधियों में
मौसम-भावनाओं के मौसम
फागुन के रंग-होली का संदेशा
 

 

दो मौन

रो उठी व्याकुल निशा
वह मौन था!
सिसकती वेदना
कराह रही उस झोंपड़ी की चेतना में
था भूख औ' बेकारी से यौवन ज़रा-सम
अकुला रही थी भूख भी
जड़वत नयन की पुतलियो में!
उस दर्द पर
मक्खियाँ थी भिनभिनातीं
और भिनभिनाहट के सिवा
हर चीज़ वहाँ खामोश थी।
क्षुधा-पीड़ित
मर चुका था!
मिट गई थी हर व्यथा
वह मौन था!!

वह मौन था!
सिसकती वेदना
जल रही थी स्वप्न की निशि होलिका में
संजोए आशा की मिटती किरण!
चिर विरह कुंठित हुई
रोती रही
गाती रही!
खो गया जीवन समूचा
उस गीत की आवाज़ में

अतिरिक्त उस आवाज़ के
जो कुछ भी था निःशब्द था।
चिर-विरही मर चुका था!
मिट गई थी हर व्यथा
वह मौन था!!

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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