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अनुभूति में महावीर शर्मा की रचनाएँ-

नई ग़ज़लें-
अदा देखो
जब वतन छोड़ा
दिल की ग़म से दोस्ती
भूलकर ना भूल पाए
सोगवारों में
 

अंजुमन में-
अधूरी हसरतें
ग़ज़ल
ज़िन्दगी से दूर
पर्दा हटाया ही कहाँ है?
प्रेम डगर
बुढ़ापा
ये ख़ास दिन

कविताओं में-
दो मौन

संकलन में-
दिये जलाओ- दीप जलते रहे
चराग आँधियों में
मौसम-भावनाओं के मौसम
फागुन के रंग-होली का संदेशा
 

  जब वतन छोड़ा

जब वतन छोड़ा, सभी अपने पराए हो गए
आंधी कुछ ऐसी चली नक़्शे क़दम भी खो गए

खो गई वो सौंधी सौंधी देश की मिट्टी कहाँ?
वो शबे-महताब दरिया के किनारे खो गए

बचपना भी याद है जब माँ सुलाती प्यार से
आज सपनों में उसी की गोद में ही सो गए

दोस्त लड़ते थे कभी तो फिर मनाते प्यार से
आज क्यों उन के बिना ये चश्म पुरनम हो गए!

किस क़दर तारीक है दुनिया मेरी उन के बिना
दर्द फ़ुरक़त का लिए अब दिल ही दिल में रो गए

था वो प्यारा-सा घरौंदा, ताज से कुछ कम नहीं
गिरती दीवारों में यादों के ख़ज़ाने खो गए

हर तरफ़ ही शोर है, ये महफ़िले-शेरो-सुखन
अजनबी इस भीड़ में फिर भी अकेले हो गए

६ अक्तूबर २००८

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