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अनुभूति में डा. रंजना गुप्ता की रचनाएँ-

छंदमुक्त में-
नदी बहती है
बौने होते गीत
ये औरतें
वक्त की आहट

गीतों में-
पीर है ठहरी
राग बसंती
वे दिन
योजना असफल
हाट और बाजार

 

 

वक्त की आहट

तुम्हारे शब्द
तलवार की तरह काट देते है
मेरा अंग-अंग
बघनखे की तरह छील देते है मेरी अंतरात्मा
और उन घावो पर तुम्हारी कुटिल हँसी
तीखे तेजाब की तरह जेहन में उतरती है
चीर देती है मेरे जिस्म को आर-पार
पर तुम शायद भूल गए हो कि
वक्त कभी किसी का सगा नही होता
आज तुम्हारे साथ है कल मेरे साथ
खड़ा होगा
किसी विशाल वृक्ष को काटने से नही
खत्म होती उसकी विरासतें
उसके पनपने की संभावनायें
जड़ों में कभी उपयुक्त अवसर पाकर अंकुरण फूटेगा
फिर शाखाओं/कोपलें और फुनगियों के
घने छतनार विकसेंगे
जिसकी भरपूर छायायें मीलों पसर जाएँगी
हजारो हजार परिंदों का घर
उसके कोटरों में घनीभूत छाया में होगा
लेकिन तब तक तुम्हारी हवेलियाँ
खण्डहर बन चुकी होंगी
और विवश होकर
अपने जलते वजूद को दफनाने
इस छाया दार वृक्ष के नीचे तुम्हें आना ही पड़ेगा
फिर मैं लौटूँगी किसी दिन
किसी समय /किसी जन्म में तुम्हारा उधार चुकाने
तुम्हें तुम्हारी पीड़ा से अवमुक्त कराने
और तभी होगा
इस प्रहसन का पटाक्षेप
तुम्हारी और मेरी दोनों कई पीड़ा का अंत

१५ सितंबर २०१६

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