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  ज़िंदगी

ज़िंदगी नहीं यह, मजबूरी है,
अपनों से दूरी,
अधूरी,
हालात के घोड़े पर सवार,
अंतहीन डगर पर,
बेमक़सद, बेमंज़िल।
पल-पल मरने का एहसास,
कदम-कदम ठोकर।
परिचित चेहरे, अनगिनत दोस्त,
एक पल रुककर पूछते हैं-
ख़ैरियत हो भाई साहब?
'न' सुनने की फुर्सत किसे?
'हा' कहना ज़रूरी है।

२१ अप्रैल २००८

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