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तेरी ज़िद
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धूल को चंदन
पेट भरते हैं
बागों में

बादल तितली धूप
मेरे घर के बाहर अक्सर
मौत ज़िंदगी पर भारी है
सिमटने की हकीकत

 

 

  पेट भरते हैं

पेट भरते हैं दाल-रोटी से।
दिन गुज़रते हैं दाल-रोटी से।

दाल- रोटी न हो तो जग सूना,
जीते-मरते हैं दाल-रोटी से।

इतने हथियार, इतने बम-गोले!
कितना डरते हैं दाल-रोटी से!

कैसे अचरज की बात है यारो!
लोग मरते हैं दाल-रोटी से।

जो न सदियों में हो सका, पल में
कर गुज़रते हैं दाल-रोटी से।

लोग दीवाने हो गए हैं नदीम,
खेल करते हैं दाल-रोटी से।

१८ अगस्त २००८

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