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अनुभूति में तरुण भटनागर की
रचनाएँ -

छंदमुक्त में-
आदमी के लिए
अकेलपन का जंगल
कभी
गुलदस्ते में फूल
चिंदियाँ
चायवाला
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बंद और खुली आँखें
बचपन का घर
बरसों से
बादलों के लिए
पहला मानसून
सूरज के साथ साथ
ठंड का कारण
उनकी यादें
विचित्र ज़िन्दगी़
विरोध के तीन तरीके
वृक्ष की मौत पर
समुद्र किनारे शाम
क्षितिज की रेखा

  चायवाला

रोज सुबह,
बिना नागा,
वह पहुँच जाता है,
नुक्कड़ वाले चौराहे पर बेचने चाय।
दो रूपये वाली उसकी चाय,
भगा देती है,
रात की बची नींद,
नींद का बचा असर।
लोगों को तैयार करती है,
नये दिन के लिए।
मिटाती है हुड़क,
हुड़क,
जिसकी गिरफ्त में कई लोग हैं,
उसके सिर्फ एक कप के लिए।
बहुतेरों ने अपने रास्ते बदल लिये हैं,
वे अब,
नुक्कड़ वाले उस चौराहे से,
उसकी दुकान से गुजरते हैं।
बस एक मुठ्ठी चेतना के लिए,
जरा सी मूर्छा भगाने,
घोलने थोड़ी सी मिठास,
भगाने जरा सी थकान,
सोचने नये सिरे से,
बैठने साथ-साथ,
करने उत्तेजक वार्तालाप,
चलाने फिर से तेज कलम,
तेजी से निबटाने अधूरा काम,
सोच की भाल तेज करने,
भगाने उबासी, मनहूसियत,
हटाने अनचाही धुंध,

उसकी दो रूपये की चाय,
बड़े दफ्तर, कचहरी, रेस्ट हाउस
और भी जाने कहाँ-कहाँ जाती है।
पर उसके पास हिसाब नहीं है,
कि,
उसने क्या-क्या किया।
वह बस बेचता है,
और शाम को हिसाब कर लेता है,
मुठ्ठी भर सिक्कों का।

९ जनवरी २००३

 

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