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अनुभूति में तरुण भटनागर की
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आदमी के लिए
अकेलपन का जंगल
कभी
गुलदस्ते में फूल
चिंदियाँ
चायवाला
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बंद और खुली आँखें
बचपन का घर
बरसों से
बादलों के लिए
पहला मानसून
सूरज के साथ साथ
ठंड का कारण
उनकी यादें
विचित्र ज़िन्दगी़
विरोध के तीन तरीके
वृक्ष की मौत पर
समुद्र किनारे शाम
क्षितिज की रेखा

  चिंदियाँ

भीतर एक बिलंग है।
जिस पर सूख रहे हैं-
चीथड़े।
बरसों बाद,
जो चिंदियाँ रही हैं,
उन्हें,
धोकर, सुखाकर, प्रेसकर
पहरने का,
एक सुकून है।
हाँ,
एक झिझक भी है,
लोग क्या सोचते होंगे,
बिना छुपी नग्नता देखकर।

९ जून २००५
 

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