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अनुभूति में विजयेन्द्र विज की रचनाएँ-

नई कविताओं में-
आड़ी तिरछी रेखाएँ
ऋतुपर्णा तुम आज भी नहीं आयीं
जुगनुओं अब तुम सितारे हो गए हो
बेचैनी
वृंदावन की विधवाएँ
शब्द तुम


कविताओं में-
अक्सर, मौसमों की छत तले
अगर किसी रोज
अरसे के बाद
आँखें
एक और वैलेन्टाइन्स डे
कभी वापस लौटेगी वो
खोजो कि वो मिल जाए
दस्तावेजों की दुनिया
मुकर गए वो लोग
रंग ज़िंदगी की तरह
लाल बत्तियों में साँस लेता वक्त
वह आवाज अक्सर मेरा पीछा करती है

सोचता हूँ

 

मुकर गए वो लोग

मुकर गए वे लोग
जिन्होंने गले लगाया
सन्नाटे में आज
हमें फिर खूब रुलाया
धुंध भरी काली रातों से
हमने आशाएँ की
आशाओं की राह ने हमको
खूब थकाया
उबर सके न उन जख्मों से
जो हमको हर बार मिले
आज उन्होंने टुकड़े दिल के
लगभग कई हज़ार किए
दफन हो गइंर् चीखें अपनी
जब भी उन्हें आवाज़ लगाई
मुकर गए वे लोग

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