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अनुभूति में विजयेन्द्र विज की रचनाएँ-

नई कविताओं में-
आड़ी तिरछी रेखाएँ
ऋतुपर्णा तुम आज भी नहीं आयीं
जुगनुओं अब तुम सितारे हो गए हो
बेचैनी
वृंदावन की विधवाएँ
शब्द तुम


कविताओं में-
अक्सर, मौसमों की छत तले
अगर किसी रोज
अरसे के बाद
आँखें
एक और वैलेन्टाइन्स डे
कभी वापस लौटेगी वो
खोजो कि वो मिल जाए
दस्तावेजों की दुनिया
मुकर गए वो लोग
रंग ज़िंदगी की तरह
लाल बत्तियों में साँस लेता वक्
वह आवाज अक्सर मेरा पीछा करती है

सोचता हूँ

 

रंग जिंदगी तरह

रंग भी जिंद़गी की तरह होते हैं
सजीव जिन्दा
जो देते हैं तमाम खुशियाँ
और तमाम दुख भी
अजीब सा रिश्ता है मेरा
इन रंगों के साथ
जब कोई भी नहीं होता
मेरे ईद गिर्द
तब भी ह़ाँ तब भी
ये चलते रहते हैं
मेरे साथ-साथ
मेरे सुख में
और दुख में भी
और तब मैं
इनसे मिलकर बनाता हूँ
एक ऐसी उम्दा तस्वीर
जो ज़िन्दा कर देती है
उन तमाम पलों को
जो कभी
मेरे हिस्से के नहीं थे

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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