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एक कविता इस तरह
झूठ मूठ समय के बीच
तुम्हारी हँसी से
तुम्हारी वजह से ही
भोपाल में बारिश
यदि तुम ईश्वर बनना चाहते हो

छंदमुक्त में-
आखर रह जाएँगे
तुम्हारे लिये एक कविता
तुमसे (एक)
तुमसे (दो)
देह की भाषा
बात यहीं खत्म नहीं होती

 

बात खत्म नहीं होती

बात खत्म नहीं होती कभी मेरे दोस्त
रहती है वह
जैसे खूब खुरहुरिया में भी खेतों में नमी
कुएँ में पानी
और आसमान के भीतरी तहखाने में बारिश की एक बूँद

तुम एक बार खुद को टटोलो
मेरे साथी कह दो
जो तुम्हारे लहू में कब से कैद है

तुम देखोगे
कि तुम्हारा एक नया जन्म हो रहा है

तुम्हारे ही अन्दर
एक नए युग की हो रही शुरूआत

१९ सितंबर २०११

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