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नयी रचनाओं में-
एक कविता इस तरह
झूठ मूठ समय के बीच
तुम्हारी हँसी से
तुम्हारी वजह से ही
भोपाल में बारिश
यदि तुम ईश्वर बनना चाहते हो

छंदमुक्त में-
आखर रह जाएँगे
तुम्हारे लिये एक कविता
तुमसे (एक)
तुमसे (दो)
देह की भाषा
बात यहीं खत्म नहीं होती

 

देह की भाषा

देह की अपनी एक भाषा
अपना व्याकरण

जब अन्य भाषाएँ हो उठतीं
कंटीली झाड़ियों की तरह जटिल
इतनी कि निकल पाना
करीब-करीब नामुमकिन

और पसर जाता आकाश जितना भारी
एक मौन
दो स्वत्वों के बीच

तब देह की भाषा में
लिखता हूँ कविताएँ

और इस तरह हर बार
बचा रहता है हमारा प्यार।

१ जून २०१५

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