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एक कविता इस तरह
झूठ मूठ समय के बीच
तुम्हारी हँसी से
तुम्हारी वजह से ही
भोपाल में बारिश
यदि तुम ईश्वर बनना चाहते हो

छंदमुक्त में-
आखर रह जाएँगे
तुम्हारे लिये एक कविता
तुमसे (एक)
तुमसे (दो)
देह की भाषा
बात यहीं खत्म नहीं होती

 

एक कविता इस तरह

मेरे कुछ उजले-पीले शब्द
तुम्हारे आँगन की
ताख पर बैठ गए हैं
उन्हें गुपचुप
एक कागज पर लिखकर
अपनी खिड़की से बाहर फेंक दो

मैं सदियों से
एक असंभव इंतजार में
खड़ा हूँ

एक कविता इस तरह
साथ मिलकर
तुम पूरी कर दो।

१ मई २०१७

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