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एक कविता इस तरह
झूठ मूठ समय के बीच
तुम्हारी हँसी से
तुम्हारी वजह से ही
भोपाल में बारिश
यदि तुम ईश्वर बनना चाहते हो

छंदमुक्त में-
आखर रह जाएँगे
तुम्हारे लिये एक कविता
तुमसे (एक)
तुमसे (दो)
देह की भाषा
बात यहीं खत्म नहीं होती

 

झूठमूठ समय के बीच

तुम झूठमूठ बैठ जाओ
एक झूठमूठ-नदी के किनारे
मैं झूठमूठ एक गीत गाऊँ
सफेद चेहरे की गहरी घाटियों में टहलते हुए
सिर्फ तुम्हारे लिए

तुम्हारी आँखों में हो झूठमूठ प्यार

और इस झूठमूठ समय के बीच
खूब-खूब सच हो
हमारा जीवन।

१ मई २०१७


 

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