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एक कविता इस तरह
झूठ मूठ समय के बीच
तुम्हारी हँसी से
तुम्हारी वजह से ही
भोपाल में बारिश
यदि तुम ईश्वर बनना चाहते हो

छंदमुक्त में-
आखर रह जाएँगे
तुम्हारे लिये एक कविता
तुमसे (एक)
तुमसे (दो)
देह की भाषा
बात यहीं खत्म नहीं होती

 

तुमसे - (एक)

कभी जब खूब तनहाई में तुम्हें आवाज दूँ
तो सुनना

जब हारने लगूँ लड़ते-लड़ते
तो खड़े होना मेरे पीछे
दुआओं की तरह

प्यार मत करना कभी मुझे
उसके लायक नहीं मैं

पर जब नफरत करने लगूँ इस दुनिया से
तुम सिखाना
कि यह दुनिया नफरत से नहीं
प्यार से ही बची रह सकती है....

१९ सितंबर २०११

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