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अनुभूति में डॉ. विनोद निगम की रचनाएँ

गीतों में-
अभी बरसेंगे घन
उनको लोग नमन करते हैं
एक और गीत का जनम हो
क्यों कि शहर छोटा है
खुली चाँदनी का गीत
घटनाओं के मन ठीक नहीं हैं
छंदों के द्वार चले आए
टूट गया एक बार फिर
यह क्या कम है
सबकी उड़तीं अलग ध्वजाएँ

 

टूट गया एक बार फिर

एक बन्द मुट्ठी भर, संचित संकल्प
उठी भुजाओं भर, अपराजित विश्वास

सारी सम्भावना पर कुंडली मारे
बैठे हैं कुछ काले नाग
और रहेगी कब तक राख की परत ओढे
विस्फोटातुर यह आग
कुछ मैले हाथों ने चोरी के धन जैसा
बाँट लिया है भविष्य
दिशाहीन पीढी के कन्धों पर बैठा है वर्तमान
सारा नेतृत्व सिर्फ गाता है कुर्सी के राग

सूख गया एक बार फिर
किसी भरे हुए ताल जैसा मन
हरे हरे खेतों में पकी फसल वाला एहसास

और लिखा जायेगा कब तक यह सारा श्रम
चन्द अकर्मण्यों के नाम
और चलेंगे कब तक
अवसर की गद्दी पर टिके मठाधीशों को
युग के परवश प्रणाम
जाने कब पूर्ण हो
मंजिल तक ले जाने वाले पथ का चुनाव,
नाप नहीं पाएँगे,बीहड़ लम्बाइयाँ
और फासले मन के
सत्ता के दल-दल में फँसे पाँव

छूट गया एक बार फिर
हाथों से तट उन्मुख लहरों का हाथ
क्षितिज पर जहाजी मस्तूलों का उगता आभास

टूट गया एक बार फिर
एक बन्द मुट्ठी भर संचित संकल्प
उठी भुजाओं भर अपराजित विश्वास..

३० मार्च २००९

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