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बाज़ार

क्या बाज़ार वही है,
हरे काग़ज़ों की ख़ातिर
पाते हैं जहाँ हम
रोटी, कपड़ा, मकान,
और जीते रहने का
थोड़ा और सामान।
या बाज़ार वो है,
ख़रीद लाते हैं जहाँ से
कुछ मीठे सपने,
और दे आते हैं
कुछ कड़वी यादें।
या फिर वो बंद गली,
बदनाम जिसे हम
अक्सर कह दिया करते हैं।
बिकता जहाँ कुछ भी नहीं
बस एक किराया होता है,
लाता कुछ नहीं आदमी
उस बंद गली से
मगर बेचकर आता है
उस बाज़ार में
खुद के ज़मीर को।

9 जनवरी 2007

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