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मैं ईराक हूँ

मैं ईराक हूँ
मुझ पर तरस खाओ
मेरी बेड़ियाँ तोड़ डालो
जो मुझे कसते जा रही हैं।

मेरी छाती पर
पश्चिम के हाथों
अबलायें लुट रही हैं,
सैनिकों के बूट
मेरे बदन को
बेरहमी से छिल रहे हैं।

कुछ बाज़ मुझे
आसमान से घूरते हैं,
मुझपर हँसते हैं।
मुझे घायल कर
भेजा करते हैं
मरहम की डिब्बियाँ
क्योंकि
आज मैं पश्चिम का
गुलाम जो बन गया हूँ।
मुझ पर तरस खाओ
मेरी बेडियाँ तोड़ डालो,
उन्हें भेज दो वापस
वर्ना मेरी ही तरह
कल तुम पर भी
हँसेंगे वो मँडराते बाज़
और
वो पत्थर की मूरत
जिसे तुम
स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी
कहते हो।

9 जनवरी 2007

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