अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में विपिन शून्य की रचनाएँ—

नई रचनाएँ
दर्द निवारक हो जाएँ
सिमटते जज़्बात
लालटेन
सफ़ेद होली
प्यार का अर्थ

कविताओं में
उम्र का पड़ाव
करवट
बाज़ार
मैं ईराक हूँ
वो जूता

 

सिमटते जज़्बात

ज़िंदगी रूठी-सी है या मैं ही ख़फ़ा हो गया,
छुप गई है ये ज़मीं या मैं यहाँ पे खो गया।

दिन रात धुआँ बन सदा पंछी के संग उड़ता गया,
उसके परों को तौलकर उसकी जुबाँ लिखता गया।

जादूगरी कुदरत की थी जहाँ पेड़ बन खुशी हो गया,
जब कभी टूटा जो पत्ता साथ उसके रो गया।

बूँद आँसू की बही मैं साथ में बहता गया,
आया पतझड़ मेरे हिस्से मैं सदा जलता गया।

बन के दाना गेहूँ का मैं भूख से लड़ता गया,
अपने सफ़र का शून्य बन मैं बस सिमटता ही गया।

9 सितंबर 2007

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter