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कविताओं में
खुद को परखना
जीना टुकड़े टुकड़
दो छोटी कविताएँ

भोले चेहरे
मैं
वसंत
शब्द

जीना टुकड़े-टुकड़े

मैं टुकड़े- टुकड़े जिया हूँ
कलियों संग खिला हूँ
काँटों संग सोया हूँ
भौरों संग डोला हूँ
कभी साथ-साथ
कभी अलग-अलग
हँसा हूँ, रोया हूँ
सब से जुड़ा हूँ
फिर भी
जुदा हूँ,
मैं टुकड़े

24 अगस्त 2007

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