अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में बिंदु भट्ट की रचनाएँ

नई रचनाएँ
अकस्मात
चित्र
तीन छोटी कविताएँ- दिशा मौत हृदय-दर्पण
समर्पित
 

कविताओं में
खुद को परखना
जीना टुकड़े टुकड़
दो छोटी कविताएँ

भोले चेहरे
मैं
वसंत
शब्द

समर्पित

ये राग द्वेष,
ये मन के स्पंदनों के विक्षेप -
सत्य रजत तमस गुणों में लिपटे
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति के वृत्त में उलझे -
संसार समुद्र की
ऊँची-ऊँची लहरों में, मुझे
पछाड़ते हैं.
क्षत-विक्षत मैं,
अकेली ही
निकल पड़ती हूँ
सुख की खोज में।
हर कहीं टकराती हूँ, स्थूल चट्टानों से।
लगता है
अंध हूँ इन उजालों में।
आखिर
थक हार कर जब
चुप्प बैठ जाती हूँ -
आँखें बंद कर लेती हूँ -
तो
बहुत धीरे से
कोई अंतरंग, परम समीप
मुझे जगाता है।
जब आँखें खुलती हैं
तब, लहरें शांत हो चुकी होती हैं।
सब कुछ
निर्मल स्पष्ट हो जाता है
जुड़ जाती हूँ सब से -
इस प्रतीति में, कि
कोई भी अलग नहीं
कुछ भी दूर नहीं
सब कुछ
यहीं है,
अभी है।

२१ जनवरी २००८

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।