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अनुभूति में रजनी भार्गव की रचनाएँ —

अनसुनी आवाज़
गरमी की एक दोपहर
घर
धूप
प्रतीक्षा
बसंत
मेरी कहानी
मौन प्रतीक
लहरों का गाँव
सीमित दायरे

 

गर्मी की एक दोपहर

कैसे हैं ये दिन, खोखले बाँस से बजते हैं
गुम हवा में टूटी आस से चुभते हैं

गलियों में हवा साँय-साँय चलती है
कैसी भटकन है, मरीचिका तो मन में बसती है

कुतरते दिन, लम्हा-लम्हा गिनते हैं
तुम्हारे साए के साथ अब भी चलते हैं

तपती ज़मीन, पाँव नहीं पड़ते हैं
फफोले पड़ गए, मेघ नहीं बरसते हैं

24 सितंबर 2007

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