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घर
आँखों में तैरते हैं कुछ बिंब,
मिट्टी का आँगन,
इधर-उधर उगती कुछ घास,
पेड़ पर बैठी गौरैया,
दरवाज़े के पीछे कुछ कमरे,
बीच में चौक,
चौक में आला,
आले में मटके
और मटकों पर से रिसता पानी,
कमरों में कुछ बोलती आवाज़ें
और चंद तस्वीरें,
ये घर की परिभाषा है
मेरा स्वरूप लिए,
घर से दूर एक नीड़ फिर बन रहा है,
मेरा अतीत अब वर्तमान बन रहा है।
24 सितंबर 2007
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