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अपने ही हाथों में
एक कमरे में
खूब नारे उछाले गए
टूटते लोगों को
वो दर्द वो बदहाली
पूछा था रात

 

अपने ही हाथों में

अपने ही हाथों में पतवार सँभाली जाए
तब तो मुमकिन है, कि ये नाव बचा ली जाए।

कुछ लुटेरों ने भी, पहना है फरिश्तों का लिबास
इनके बारे में ग़लतफ़हमी न पाली जाए।

पूरे गुलशन का चलन, चाहे बिगड़ जाए मगर
बदचलन होने से, खुशबू तो बचा ली जाए।

ये शमां कैसी है रह-रह के धुआँ देती है
काश ये बुझने से पहले ही बचा ली जाए।

इन धुआँती-सी मशालों को जलाने के लिए
राख के ढेर से, कुछ आग निकाली जाए।

लोग ऐसे भी कई जीते हैं इस बस्ती में
जैसे मजबूरी में, इक रस्म निभा ली जाए।

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