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अनुभूति में लक्ष्मी शंकर वाजपेयी की रचनाएँ

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अपने ही हाथों में
एक कमरे में
खूब नारे उछाले गए
टूटते लोगों को
वो दर्द वो बदहाली
पूछा था रात

 

टूटते लोगों को

टूटते लोगों को उम्मीदें नई देते हुए
लोग है कुछ, ज़िंदगी को ज़िंदगी देते हुए।

नूर की बारिश में जैसे, भीगता जाता है मन,
एक पल को भी किसी को इक खुशी देते हुए।

याद बरबस आ गई माँ, मैंने देखा जब कभी
मोमबत्ती को पिघलकर, रोशनी देते हुए।

आज के इस दौर में, मिलते है ऐसे भी चिराग़
रोशनी देने के बदले, तीरगी देते हुए।

इक अमावस पर ये मैंने, रात के मुँह से सुना
चाँद बूढ़ा हो चला है, चाँदनी देते हुए।

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