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अनुभूति में ॉ. कृष्ण कन्हैया की रचनाएँ -

कविताओं में-
खाई
उम्दा
रेशमी कीड़ा
रात
वस्त्र
सामीप्य
वैमनस्य

 

वस्त्र

वस्त्र
तुम सिर्फ़ वस्तु मात्र नहीं
क्या यह एक मौलिक बात नहीं?
एक आवरण
जो समाज की नंगी आँखों
और शरीर की गरिमा के बीच
एक दीवार-सी खड़ी रहती है
क्या इसकी अहमियत
भोजन और आवास से
बढ़ कर नहीं होनी चाहिए?
क्योंकि-
भूखों की मौत में दिन
बेघरों की मौत में महीने
लग सकते हैं
पर शर्मसार मौत में
क्षण से भी
कम वक्त लगता है
अगर मरनेवाले में
गैरत हो
और
आचरण जिसके लिए
धन और बदन से
ऊपर हो!

१८ फरवरी २००८

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