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बसंत आया
पारस
विदा की अगन
सूरज में गर्मी ना हो
हँसी 

 

बसंत आया

क्या तुम्हारे शहर में भी सुर्ख गुलमोहर की कतारें हैं
क्या अमलतास की रंगोबू तुम्हें भी दीवाना करती है
क्या भरी दोपहरी में तुम्हारा भी भटकने को जी करता है
अगर हाँ तो सुनो जो यों जीता है वो पल-पल मरता है
क्योंकि हर क्षण कहीं कोई पेड़ तो कहीं सर कटता है।

 

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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