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विदा की अगन

मैं कोयला हूँ कहो तो आग दूँ
या फिर धुआँ कर दूँ।
मुझे डर है ना दर्देदिल
निगाहों से बयाँ कर दूँ।

मुझे अफ़सोस है तुमने मुझे
अपना नहीं समझा।
खुशी तो बाँट ली मुझ से
मगर गम पास ही रखा।

सुना था दिल की मिट्टी में
ये गम बन फूल खिलता है।
बेगरज दोस्त दुनिया में
बड़ी किस्मत से मिलता है।

चलो छोड़ो गिले शिकवे
विदा होने की बारी है।
इस कोयले में चमक जो है
अमानत वो तुम्हारी है।

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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