अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में शार्दूला की रचनाएँ

नई रचना
चार छोटी कविताएँ

कविताओं में
आराधना
चाहत के चिराग
तेरे पीछे माया
दोस्त
दोहे
बसंत आया
पारस
विदा की अगन
सूरज में गर्मी ना हो
हँसी 

 

पारस

मैं तो पारस हूँ , मेरी जात है सोना करना
अपनेपन की उम्मीद दोस्त मुझसे क्या करना!

हर मोड़ पे हो जिसके बिछुड़ जाने का डर
ऐसे राही के संग यारों सफ़र ना करना।

गर फूल खिलाते हो दिल की मिट्टी में
एक आँख में सूरज़, एक में शबनम रखना।

मैंने इन होठों से जिनको छुआ था जाते समय
उसने छोड़ा है उन जख़्मों पे मरहम रखना।

वो मेरे आँख का मोती था या हाथों का नगीना
जो गुम गया अब उस पे बहस क्या करना!

मुझको खुदा दुनिया में गर फिर लाएगा
दिल मेरा बड़ा, उमर मेरी ज़रा कम रखना।

मैं तो पारस हूँ, मेरी जात है सोना करना
अपनेपन की उम्मीद दोस्त मुझसे क्या करना!

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

website metrics