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अनुभूति में प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण की
रचनाएँ-

नयी कविताओं में-
अपने को मिटाना सीखो
एक दिन

ये मेरे कामकाजी शब्द

कविताओं में-
उभरूँगा फिर
एक धुन की तलाश
गुज़रे कल के बच्चे
घर लौट रहे बच्चे
चलती है हवा
जापान में पतझर
झरती पत्तियों ने
दिन दिन और दिन

ध्वन्यालेख तन्मयता के
निराला को याद करते हुए
मुक्ति
मौसम
लक्ष्य संधान
वसंत से वसंत
सार्थक है भटकाव

सुनो सुनो

  चलती है हवा

चलती है हवा तो हो जाती है बरसात
पानी की बूँदों की तरह
पत्तियों पर पत्तियाँ झर रहीं हैं
चुपचाप!
थर-थर काँपती घाटी
बेसुध हो, झील में
नहा रही है
पानी से उठती धुंध ने पर
ढक दी है उसकी लाज!

चलती है हवा तो सिहर उठता है
सिल्क के रंगीन दुपट्टे की तरह
नदी का जल!

आसमान पर छाए हैं
उचक्के चोर बादल
नदी में उतर
अपने सफेद झोलों में
जल्दी-जल्दी भर रहे हैं
बेशुमार रंग!

बसंती फूलों पर
मरने वालों का कौन समझाए,
पतझरी पत्तियों की नश्वरता में
छिपी है कैसी अमरता!

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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