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अनुभूति में प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण की
रचनाएँ-

नयी कविताओं में-
अपने को मिटाना सीखो
एक दिन

ये मेरे कामकाजी शब्द

कविताओं में-
उभरूँगा फिर
एक धुन की तलाश
गुज़रे कल के बच्चे
घर लौट रहे बच्चे
चलती है हवा
जापान में पतझर
झरती पत्तियों ने
दिन दिन और दिन

ध्वन्यालेख तन्मयता के
निराला को याद करते हुए
मुक्ति
मौसम
लक्ष्य संधान
वसंत से वसंत
सार्थक है भटकाव

सुनो सुनो

  मुक्ति

कल जब मैं नहीं रहूँगा
और मेरे शब्द रहेंगे
तब उनके अर्थ भी बदल जाएँगे
वे मेरी छाया से मुक्त हो चुके होंगे

मेरे राग-द्वेष
मेरी प्रतिबद्धता
और मेरी शरारतों से परे
सीप में मोती की तरह
खुल जाएँगे उनके अर्थ

कल जब मैं नहीं रहूँगा तब
मेरे शब्दों को ढाल बना
स्वार्थों की लड़ाई लड़ेंगे लोग
मेरे शब्दों की ओट में
खेलेंगे
लुका छिपी का खेल

तब मैं अपने शब्दों में कहीं नहीं हूँगा
और यही मेरी मुक्ति का क्षण होगा।

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