अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 

अनुभूति में डॉ. सुषम बेदी की रचनाएँ-

नई रचनाएँ-
अस्पताल का कमरा
उम्र के मानदंड
कलियुग की दोस्तियाँ
घर- दो कविताएँ
जंगल- दो कविताएँ
बसंत के खेल
फूलों का राज्य
 

कविताओं में -  
अतीत का अंधेरा
ऋषिकेश
औरत
घर और बग़ीचा
पीढ़िया
माँ की गंध
सूत्र
हिमपात
हुजूम

संकलन में-
गुच्छे भर अमलतास-
हवाई

  घर-१

तुमने जो कुछ भी किया
अहसान था
तुम्हारी ही बड़ाई थी
उदारपन था।
सराहे गए
भले कहलाए भी गए।

मैंने जो कुछ भी किया
मेरा कर्तव्य था
दायित्व था

न करने में कोताही थी, कामचोरी थी
मेरे व्यक्तित्व की एक कमी
या कमज़ोरी थी।

घर
तुम्हारे लिए
एक आरामदायक घरौंदा था
बाहर से थकेहारे आनेवाले का
आश्रय
और विश्रामस्थल!

घर
मेरे लिए
कामों, झंझटों, फसादों, फिक्रों,
करने
और करने,
करते ही चले जाने का
एक कभी न रुकनेवाला
अंतहीन
सिलसिला।

 

घर - २

घर ने तुम्हारे लिए फूल चुने
पाँवड़े बिछाए
ठंडे पानी के ग्लास के साथ
प्यासे को राहत थी
थकेमांदे को
चाय का प्याला
और भूख लगने से पहले ही
परोस दिए अनगिनत व्यंजन।

घर ने मुझे दिया
रसोई का धुआँ
बर्तनों की खटपट
धूल से भरे कोने
मैले कपड़ों के ढेर
थकानेवाले कितने ही
अनचाहे फैलाव
जिनको बीनती, समेटती, सुलझाती,
मैं गलाती रही
उम्र का हर
हुलसता, उजलता, महकता
या अँधियारों में सुबकता
टटोलता
दिन और रात!

५ मई २००८

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

website metrics