अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में लक्ष्मी शंकर वाजपेयी की रचनाएँ

छंदमुक्त में-
अँधेरों के दिन
ढिठाई
रिश्तेदारी
विदाई

हाइकु में-
बारह हाइकु

अंजुमन में-
अपने ही हाथों में
आदमी के साथ
एक कमरे में
खूब नारे उछाले गए
चाँद पूनम का
टूटते लोगों को
दर्द से दामन
पगडंडियाँ बनाएँगे
भूली यादों
वो दर्द वो बदहाली
पूछा था रात

 

रिश्तेदारी

नहीं, यह भी संभव नहीं होता
कि उनके शहर जाकर भी
जाया ही न जाय रिश्तेदारों के घर
अकसर कुछ एहसान लदे होते हैं
उनके बुजुर्गों के अपने बुजुर्गों पर
ऐसा कुछ न भी हो, तो
जरूरी होता है लोकाचार निभाना
किंतु अकसर खड़ी हो जाती है समस्या
कि पत्नी की कुशलक्षेम, बच्चों की
सुचारू पढ़ाई का विवरण दे देने
तथा ’और क्या हाल-चाल हैं‘ का कई-कई बार
उत्तर दे देने के बाद,
कैसे जारी रखा जाय संवाद
अकसर बोझिल हो जाते हैं
चाय आने के बीच के क्षण,
और अकसर देर लगती है चाय आने में
क्योंकि उधर से भी रिश्तेदारी निभाने के प्रयास
प्रकट होते हैं चाय के साथ की सामग्री बनकर
चाय के बाद बनती है कुछ राहत की स्थिति
कि अब कुछ देर बाद
माँगी जा सकती है आज्ञा
और खाना खाकर जाने की मनुहार पर
कुछ बहाने बनाकर
उठा जा सकता है कुछ औपचारिक संबोधनों
तथा फिर मिलने-जुलने
या चिट्ठी लिखने के वादों के साथ!

४ फरवरी २०१३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter