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अनुभूति में संजय ग्रोवर की रचनाएँ

नई ग़ज़लें
इनको बुरा लगा
दर्द को इतना जिया
दासी बना के मारा
रोज़ का उसका

महिला दिवस पर विशेष
स्त्री थी कि हँस रही थी
हमारी किताबों में हमारी औरतें

अंजुमन में
असलियत के साथ
आज मुझे
आ जाएँगे
किस्सा नहीं हू
कोई बात हुई
ग़ज़लों में रंग
जो गया
डर में था
तितलियाँ
तुम देखना
तौबा तौबा
बह गया मैं
बाबा
मौत की वीरानियों में
मंज़िलों की खोज में
लड़केवाले लड़कीवाले
लोग कैसे ज़मीं पे
सच कहता हूँ
सोचना
हो गए सब कायदे

 

डर में था

जाने मैं किस डर में था
फिर देखा, तो घर में था

जो ढब कट्टर लोगों का है
वही कभी बंदर में था

लोग नए थे बात पुरानी
क्या मैं किसी खंडहर में था

बच निकला उससे, तो जाना
वो भी इसी अवसर में था

उनके ज़ख़्म सजे थे तन पर
मेरा दर्द जिगर में था

1 जुलाई 2006

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