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अनुभूति में संजय ग्रोवर की रचनाएँ

नई ग़ज़लें
इनको बुरा लगा
दर्द को इतना जिया
दासी बना के मारा
रोज़ का उसका

महिला दिवस पर विशेष
स्त्री थी कि हँस रही थी
हमारी किताबों में हमारी औरतें

अंजुमन में
असलियत के साथ
आज मुझे
आ जाएँगे
किस्सा नहीं हू
कोई बात हुई
ग़ज़लों में रंग
जो गया
डर में था
तितलियाँ
तुम देखना
तौबा तौबा
बह गया मैं
बाबा
मौत की वीरानियों में
मंज़िलों की खोज में
लड़केवाले लड़कीवाले
लोग कैसे ज़मीं पे
सच कहता हूँ
सोचना
हो गए सब कायदे

 

सोचना

ओस की बूँदों में ठहरी ज़िंदगी को सोचना
और फिर बहती नदी की गंदगी को सोचना

अश्क पी कर भी तनी गरदन की बाबत सोच कर
खून पी कर सर झुकाती बंदगी को सोचना

खाट पर पसरी हुई मेहमान अंग्रेज़ी के साथ
अपने घर में हिंदी की लाचारगी को सोचना

दुश्मनों के खौफ़ से पीछा छुड़ाना हो अगर
दोस्तों में कुलबुलाती दुश्मनी को सोचना

जिस घड़ी मन कृष्ण जैसी रासलीलाएँ रचे
उस घड़ी इक पल ठहर कर द्रौपदी को सोचना

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।