अंजुमन । उपहार ।कवि । काव्य चर्चा । काव्य संगम । किशोर कोना । गौरव ग्राम गौरवग्रंथ । दोहे । रचनाएँ भेजें । नई हवा । पाठकनामा । पुराने अंक । संकलन हाइकु । हास्य व्यंग्य । क्षणिकाएँ । दिशांतर । समस्यापूर्ति
अनुभूति में संजय ग्रोवर की रचनाएँ
नई ग़ज़लें इनको बुरा लगा दर्द को इतना जिया दासी बना के मारा रोज़ का उसका महिला दिवस पर विशेष स्त्री थी कि हँस रही थी हमारी किताबों में हमारी औरतें
अंजुमन में असलियत के साथ आज मुझे आ जाएँगे किस्सा नहीं हूँ कोई बात हुई ग़ज़लों में रंग जो गया डर में था तितलियाँ तुम देखना तौबा तौबा बह गया मैं बाबा मौत की वीरानियों में मंज़िलों की खोज में लड़केवाले लड़कीवाले लोग कैसे ज़मीं पे सच कहता हूँ सोचना हो गए सब कायदे
सच कहता हूँ
या तो मैं सच कहता हूँ या फिर चुप ही रहता हूँ
डरते लोगों से डर कर सहमा-सहमा रहता हूँ
बहुत नहीं तैरा, लेकिन खुश हूँ, कम ही बहता हूँ
बाहर दीवारें चुन कर भीतर-भीतर ढहता हूँ
कुछ अनकही भी कह जाऊँ इसीलिए सब सहता हूँ
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