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अनुभूति में संजय ग्रोवर की रचनाएँ

नई ग़ज़लें
इनको बुरा लगा
दर्द को इतना जिया
दासी बना के मारा
रोज़ का उसका

महिला दिवस पर विशेष
स्त्री थी कि हँस रही थी
हमारी किताबों में हमारी औरतें

अंजुमन में
असलियत के साथ
आज मुझे
आ जाएँगे
किस्सा नहीं हू
कोई बात हुई
ग़ज़लों में रंग
जो गया
डर में था
तितलियाँ
तुम देखना
तौबा तौबा
बह गया मैं
बाबा
मौत की वीरानियों में
मंज़िलों की खोज में
लड़केवाले लड़कीवाले
लोग कैसे ज़मीं पे
सच कहता हूँ
सोचना
हो गए सब कायदे

 

लोग कैसे ज़मीं पे

लोग कैसे ज़मीं पे चलते हैं
देख, सूरज के पाँव जलते हैं

उन्हीं ख़्वाबों में ही तो ज़िंदा हूँ
मेरी आँखों में जो भी पलते हैं

लोग होते हैं पर नहीं होते
भीड़ में जब कभी निकलते हैं

लोग बेहिस, घरों के साए में
हम दरख़्तों के साथ चलते हैं

लोग होते हैं कामयाब तभी
जब भी अपना-सा बन के छलते हैं

लोग शहरों में आके बसते हैं
जब कभी इनके पर निकलते हैं

धूप अब इनको रास आती है
चाँदनी में ये जिस्म जलते हैं

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।