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अनुभूति में अक्षय कुमार की रचनाएँ—

छंदमुक्त में—
अंधियारे का एक पूरा युग
इनसारन और भगवान की दुनिया
उगा है कहीं सूरज
उलझी हुई गुत्थी
ऊँचे उठना चाहते हो
कल ही की बात
गलतियाँ कर के भी
गांव की बातें
ट्रेन की खिड़की
तोपों और बंदूकों से
दिवस मूर्खों का
नहीं सहा जाता
पखवारे के हर दिन
पत्थर  
पतझड़ी मौसम
परिभाषाएँ
पर्वत तो फिर पर्वत है
बुढ़ापा
राजधानी की इमारतें
स्वप्न आखिर स्वप्न
सच क्या है

  दिवस मूर्खों का

दिवस मूर्खों का
और मनाते हैं बुद्धिमान
चलाते रहते हैं जश्न
साल दर साल
हर सुबह व्रत लेते हैं
ऊँघने का
हर शाम उठाते हैं जाम
जोड़-तोड़ का
खाते हैं कसमें
अंधा बन, अपनों को ही
रेवड़ियाँ बाँटने की
और, इस प्रकार
शुरू करते हैं हर बार की तरह
फिर एक नया क्रम, एक नया साल
जिसकी परिपाटी
अब पुरानी हो चली है
ठीक,
बाबा के हिलते दाँत की तरह।

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