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अनुभूति में अक्षय कुमार की रचनाएँ—

छंदमुक्त में—
अंधियारे का एक पूरा युग
इनसारन और भगवान की दुनिया
उगा है कहीं सूरज
उलझी हुई गुत्थी
ऊँचे उठना चाहते हो
कल ही की बात
गलतियाँ कर के भी
गांव की बातें
ट्रेन की खिड़की
तोपों और बंदूकों से
दिवस मूर्खों का
नहीं सहा जाता
पखवारे के हर दिन
पत्थर  
पतझड़ी मौसम
परिभाषाएँ
पर्वत तो फिर पर्वत है
बुढ़ापा
राजधानी की इमारतें
स्वप्न आखिर स्वप्न
सच क्या है

  उलझी हुई गुत्थी

उलझी हुई,
गुत्थी के सुलझाने की
जल्दी में
एक के बाद एक
धागे को
तोड़ता चला जाता हूँ
टुकड़ों-टुकड़ों में
लो, आखिरकार
उलझन सुलझ तो गई
लेकिन,
यह क्या?
कितना दुश्वार हो गया है
फिर से जोड़ना
इतने सारे टूटे टुकड़ों को।
उफ,
कितनी गाँठों को
निमंत्रण दे दिया है
मैंने।

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