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अनुभूति में अक्षय कुमार की रचनाएँ—

छंदमुक्त में—
अंधियारे का एक पूरा युग
इनसारन और भगवान की दुनिया
उगा है कहीं सूरज
उलझी हुई गुत्थी
ऊँचे उठना चाहते हो
कल ही की बात
गलतियाँ कर के भी
गांव की बातें
ट्रेन की खिड़की
तोपों और बंदूकों से
दिवस मूर्खों का
नहीं सहा जाता
पखवारे के हर दिन
पत्थर  
पतझड़ी मौसम
परिभाषाएँ
पर्वत तो फिर पर्वत है
बुढ़ापा
राजधानी की इमारतें
स्वप्न आखिर स्वप्न
सच क्या है

  इन्सान, भगवान और दुनिया

इन्सान,
भगवान,
और, दुनिया
मुश्किल है कितना
एक साथ निगाह रख पाना, इन तीनों पर,
लेकिन,
आसान है संभवत:
बहती धार में खुद को छोड़ देना
हो सकता है कि मंज़िल मिल जाए
यह भी संभव है
कि उफनती लहरें
तुम्हें ही किनारा समझकर
काट फेंके ज़मीन से तुम्हारे
सारे रिश्ते
बहा ले जाएँ तुम्हारे पूरे अस्तित्व को ही
लेकिन,
मत भूलो
स्थिरता मौत है
और बहना,
जीवन।

 

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