अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में रवींद्र स्वप्निल प्रजापति
की रचनाएँ-

नई रचनाएँ-
ओ मेरे शरीर
कुछ दिन और मैं
झील- तीन कविताएँ
मैं इश्क का दिन हुआ
सफर

छंद मुक्त में-
आज़ादी
आसमाँ
एक दृश्य
कीमत
कोई आशा
तू रौशनी की तरह
दिल की दुनिया
दोस्ती
पाँच छोटी कविताएँ
मेरी नसों में बह रहा है शहर
मैंने तुम्हें
यों हमने प्यार किया
समय की चादर

 

यों हमने प्यार किया

मेरे शहर में अंधेरा पुल और जंगल था
मेरी तरफ़ अंधेरा और जंगल था
और तुम्हारी तरफ़ पुल और शहर था

मैं अंधेरे में एक कदम चला
और तुम शहर से पुल के पास आ गईं
चाँदनी रात में वक्त का पानी था
जैसे संसार की हर गति का प्रतिबिम्ब था
फिर मैंने पानी में अपना कदम रखा
और फिर तुम बेतवा बन गईं

हम नदी के साथ थे
मैं पुल का पिलर और तुम लहर थीं
वक्त का पानी बहता रहा हमें छूकर
क्यों हमने प्यार किया और वक्त के गवाह बने
आज लाखों साल बाद
राह पानी हमारे बीच बह रहा है
चारा

तुम चुप थीं और मैं भी चुप था
हमारे बीच चारा का कप था
धूप का सुनहरा रंग लिए
उसकी सुनहरी किनार पर
तुम्हारी आँखें चमक रही थीं

बहुत देर तक चारा एक
ज़िंदगी की उपेक्षा में ठंडी होती रही
फिर तुमने उँगली से चारा पर जमी परत हटा दी
मैंने कप को उठा कर ओंठों से लगा लिया

५ जनवरी २००९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter