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अनुभूति में संगीता मनराल की
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बड़ी हो गई हूँ मैं
मुठ्ठी में जकड़ा वक्त
माँ
मेरे गाँव का आँगन
रात में भीगी पलकें
वे रंग

 

वे रंग 

देख न पाया ज़माना
वे रंग
जो चिपके थे बदन से मेरे
फिर खयाल आया
वे रंग तो सने थे आँसुओं से मेरे
और आँसू
बह चले थे तेरे खयालों में
धुल गए थे रंग सारे 
तभी तो
देख ना पाया ज़माना
वे रंग 
जो चिपके थे बदन से मेरे

२४ मार्च २००५

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