उत्सव नव वर्ष का
पत्र व्यवहार का पता

अभिव्यक्ति तुक-कोश

२५. १२. २०१५

अंजुमन । उपहार । काव्य संगम । गीत । गौरव ग्राम । गौरवग्रंथ । दोहे । पुराने अंक । संकलन । अभिव्यक्ति
कुण्डलिया । हाइकु । अभिव्यक्ति । हास्य व्यंग्य । क्षणिकाएँ । दिशांतर । नवगीत की पाठशाला । रचनाकारों से

 

जी गए पूरा बरस  

नये तराने

 

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जी गए पूरा बरस बस लिये खाली हाथ
और अच्छे दिन हमारे
घर नहीं आये।

रोज उगता रहा सूरज
मगर ज्यों का त्यों अँधेरा
धूप की बस बाट जोहे
आज भी बैठा सबेरा

धुंध, कुहरे ने नहीं छोड़ा अभी तक साथ
और हम यों ही खड़े हैं
रोज मुँह बाये।

चलो चलते हैं समय के
पास तो होंगे उजाले
करें हम मजबूर शायद
धूप मुट्ठी भर उछाले

हाथ जोड़ें उन्हें कब तक कहें दीनानाथ
सूर्य ने तो ओढ़ रक्खे
दंभ के साये

- डॉ. प्रदीप शुक्ल
  नए वर्ष के नए तराने
रूठों को भी चलो मना लें
संबंधों के राजमहल में
हर रिश्ते को गले लगा लें

परिभाषा बदलें जीवन की
पढ़ लें सब भाषाएँ मन की
दुखद समय को भूलें सब ही
नव-आशा का हार बना लें

नए वर्ष के नए तराने
रूठों को भी चलो मना लें
हर रिश्ते को गले लगा लें

अहं गले, नेह फैले बस
अब न उठे काँधे पर तरकश
सिंदूरी प्रात:की बेला
सजी हुई है, प्रेम सजा लें
रूठों को भी चलो मना लें

नए वर्ष के नए तराने
रूठों को भी चलो मना लें
हर रिश्ते को गले लगा लें

- प्रणव भारती

उत्सव नव वर्ष का



गीतों में-

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अश्विनीकुमार विष्णु

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आकुल

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उमाप्रसाद लोधी

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डॉ. प्रदीप शुक्ल

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पद्मा मिश्रा

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प्रणव भारती

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दोहों में-

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ज्योतिर्मयी पंत

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रघुविन्द्र यादव

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अंजुमन में-

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कल्पना रामानी

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सुरेन्द्रपाल वैद्य

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छंदमुक्त में-

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अमृता प्रीतम

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उमेश मौर्य

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जयप्रकाश मानस

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संपादन¸ कलाशिल्प एवं परिवर्धन : पूर्णिमा वर्मन

सहयोग :
कल्पना रामानी