अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में चंद्रभान भारद्वाज की रचनाएँ -

नई रचनाएँ-
नहीं मिलते
मैं एक सागर हो गया
राह दिखती है न दिखता है सहारा कोई
हर किरदार की अपनी जगह

अंजुमन में-
अधर में हैं हज़ारों प्रश्न
आदमी की सिर्फ इतनी
उतर कर चाँद
कदम भटके
कागज पर भाईचारे
कोई नहीं दिखता
खोट देखते हैं
गगन का क्या करें
जब कहीं दिलबर नहीं होता
ज़िन्दगी बाँट लेंगे
गहन गंभीर
तालाब में दादुर
दुखों की भीड़ में
नाज है तो है
नदी नाव जैसा
पीर अपनी लिखी
फँसा आदमी
मान बैठे है
रात दिन डरती हुई-सी

रूप को शृंगार
सत्य की ख़ातिर
सिमट कर आज बाहों में

संकलन में- होली पर

   अधर में हैं हज़ारों प्रश्न

अधर में हैं हज़ारों प्रश्न कोई हल नहीं मिलता,
टिकाने को ज़रा सा पाँव भी भूतल नहीं मिलता।

निगाहें ताकती रहतीं महज़ आकाश को हर दम,
क्षितिज पर दूर तक पानी भरा बादल नहीं मिलता।

न जाने कब चुरा कर ले गया बहुरूपिया मौसम,
घटा की आँख में आँजा हुआ काजल नहीं मिलता।

कुल्हाड़ी की निगाहों से बचा ले आबरू अपनी,
किसी भी पेड़ को ऐसा कहीं जंगल नहीं मिलता।

सिमट कर चीथड़ों में उम्र सारी बीत जाती है,
कुँवारी कामना को रेशमी आँचल नहीं मिलता।

कुआँ से बावड़ी तक झील तालों से तलैयों तक,
भरी है सिर्फ़ दलदल अन्जुरी भर जल नहीं मिलता।

कहीं काँटे बिछे मिलते कहीं पत्थर गड़े मिलते,
कि 'भारद्वाज' कोई रास्ता समतल नहीं मिलता।

१४ सितंबर २००९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter