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अनुभूति में
चंद्रभान भारद्वाज
की रचनाएँ -
नई रचनाएँ-
कोई नहीं दिखता
गगन का क्या करें
जब कहीं दिलबर नहीं होता
नाज है तो है
मान बैठे है
अंजुमन
में-
अधर में हैं हज़ारों प्रश्न
आदमी की सिर्फ इतनी
उतर कर चाँद
कदम भटके
कागज पर भाईचारे
गहन गंभीर
तालाब में दादुर
दुखों की भीड़ में
पीर अपनी लिखी
रात दिन डरती हुई-सी
रूप को शृंगार
सत्य की ख़ातिर
सिमट कर आज बाहों में
संकलन में-
होली पर
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गगन का क्या करें
जब परों पर बंदिशें हों तो गगन
का क्या करें
हर कली गर्दिश में हो ऐसे चमन का क्या करें
ज़िंदगी भर तन का ढँकना हो नहीं पाया नसीब
मौत के दिन यार रेशम के कफ़न का क्या करें
बस्तियाँ तो जल रही हैं उठ रहा काला धुआँ
घुल रहा है विष हवाओं में हवन का क्या करें
जो दबी चिनगारियों को तो बना देती लपट
पर बुझा देती दियों को उस पवन का क्या करें
तान कर सीना खड़ा है सामने मुजरिम स्वयं
हो नहीं तामील कागज के समन का क्या करें
हाथ में पत्थर लिए इस ओर भी उस ओर भी
खून से माथा सना चोटिल अमन का क्या करें
फ़र्क़ 'भारद्वाज' कथनी और करनी में बहुत
जो कभी पूरा न हो झूठे वचन का क्या करें
३१ अक्तूबर २०११ |