अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथ
दोहे पुराने अंकसंकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में चंद्रभान भारद्वाज की रचनाएँ -

नई रचनाएँ-
कोई नहीं दिखता
गगन का क्या करें
जब कहीं दिलबर नहीं होता
नाज है तो है
मान बैठे है

अंजुमन में-
अधर में हैं हज़ारों प्रश्न
आदमी की सिर्फ इतनी
उतर कर चाँद
कदम भटके
कागज पर भाईचारे
गहन गंभीर
तालाब में दादुर
दुखों की भीड़ में
पीर अपनी लिखी
रात दिन डरती हुई-सी

रूप को शृंगार
सत्य की ख़ातिर
सिमट कर आज बाहों में

संकलन में- होली पर

  तालाब में दादुर

कभी सूखे हुए तालाब में दादुर नही आते,
सड़ा हो बीज तो उस बीज में अंकुर नही आते।

कला की साधना में उम्र सारी बीत जाती है,
हवा के फूँकने से बाँसुरी में सुर नहीं आते।

भले हो उर्वरा धरती भले अनुकूल मौसम हो,
करेले की लताओं पर कभी माधुर नहीं आते।

अगर इक पाँव को बैसाखियों की हो गई आदत,
थिरकने के लिए उस पाँव में नूपुर नहीं आते।

यहाँ उस आदमी को कामयाबी मिल नहीं सकती,
जिसे इक झूठ सच में ढालने के गुर नहीं आते।

बचाने के लिए इज़्ज़त कभी धनिया नहीं मरती,
अगर उस रात घर में गाँव के ठाकुर नहीं आते।

हमेशा उर्स पर वह मारते रहते हमें ताना,
कि 'भारद्वाज' तुम अजमेर या जयपुर नहीं आते।

२५ मई २००९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter