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अनुभूति में प्राण शर्मा की रचनाएँ

नई रचनाएँ—
कितनी हैरानी

घर पहुँचने का रास्ता
छिटकती है चाँदनी

अंजुमन में—
उड़ते हैं हज़ारों आकाश में
गुनगुनी सी धूप
चेहरों पर हों
मुँडेरों पर बैठे कौओं
सुराही
हर एक को

 

घर पहुँचने का रास्ता

जग में मुरीद अपना बनाता किसे नहीं
फनकार अपने फन से रिझाता किसे नहीं

घर में वो अपनी ज़िद्द से सताता किसे नहीं
ऐ दोस्त जिद्दी बच्चा रुलाता किसे नहीं

इतना भी भूला भटका किसी को नहीं समझ
घर पहुँचने का रास्ता आता किसे नहीं

हमने सुनाई आपको तो क्या बुरा किया
हर शख़्स अपनी खूबी सुनता किसे नहीं

यूँ तो किसी को भूलना आसां नहीं मगर
एहसान फरामोश भुलाता किसे नहीं

खुदगर्ज़ इतना है की ज़रूरत में दोस्तों
इंसान अपना दोस्त बनाता किसे नहीं

ए "प्राण" बच के रहना निगाहों से तुम उसकी
दुश्मन डगर से अपनी हटाता किसे नहीं

४ फ़रवरी २००८ 

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