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गुनगुनी सी धूप
चेहरों पर हों
मुँडेरों पर बैठे कौओं
सुराही
हर एक को

 

गुनगुनी सी धूप

गुनगुनी सी धूप में छाया न कर
मस्त मौसम का मज़ा ज़ाया न कर

डालियाँ झंझोड़ कर जाया न कर
कोंपलों पर जुल्म यूँ ढाया न कर

मुस्करा कुछ तो खुशी के वास्ते
शुभ घड़ी में मुँह को लटकाया न कर

बेरुख़ी, नाराज़गी, शिकवा, गिला
हर किसी के घर में ले जाया न कर

सादगी में रूप कुछ कम तो न था
बन सँवर कर और तड़पाया न कर

लाज रख ए 'प्राण' बढ़ती उम्र की
चोंचले बढ़-चढ़ कर दिखलाया न कर 

४ सितंबर २००३

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