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गुनगुनी सी धूप
चेहरों पर हों
मुँडेरों पर बैठे कौओं
सुराही
हर एक को

 

हर एक को

हर एक को कुटुंब में अपने सा ढालना
कितना कठिन है दोस्तों घर को संभालना

आनंद की फुहार है चंदन की गंध है
जादू जगाता माँओं की बाहों का पालना

वो माँगता है एक खिलौना ही तो जनाब
सोचें कि क्या ये ठीक है बच्चे को टालना

जिसको उजाड़ कर गए बच्चे शरारती
होता न काश वो किसी चिड़िया का आलना

खुल कर निकाल लीजिए दिल की भड़ास को
आसान है ज़माने पे कीचड़ उछालना

ए 'प्राण' रास आई है किस मन को दुश्मनी
ये तो गली है संकरी खुद को निकालना

२४ सितंबर २००३

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।